गौसेवा

आजकल हमारे देश में गोधन का प्रतिदिन ह्रास होता जा रहा है, जिससे गाय का दूध एवं लाभोंके अभाव में हाहाकार मचा हुवा है | शास्त्रता और लोकतः विचार करके देखें तो यह मालूम होगा की धनों में गोधन प्रधान संरक्षणीय धन है | अतः हम सबको अपनी शक्ति के अनुसार गोधन की रक्षा करनी चाहिए | हम सब यदि गौवों की सेवा नहीं करते हैं तो यह हमारी कृतघ्नता है ; क्योंकि हम सब गौवों से जितना लाभ उठाते हैं, उसके बदलेमें उनकी सेवा न करें तो यह हमारी कृतघ्नता ही कही जाएगी |

lord_krishnas_cow

वास्तव में गौवों की सेवाके विषय में केहेनेका अधिकारी भी में नहीं हूँ ; क्योंकि जैसे आप लोग दूध पीते हैं वैसे में भी पीता हूँ | गौसेवा आप भी नहीं करते और मुझसे भी नहीं बनती | अच्छे पुरुष, जिन्होंने गौवों की सेवा की है, उनके द्वारा तथा शास्त्रके द्वारा अपनेको जो शिक्षा मिल रही है, उसको आधार बना कर हम लोगों को गौवों की सेवा करनी चाहिए |

पूर्व के ज़माने में नंद राजा के यहाँ लाखों गायें थीं | विराट के पास करीब एक लाख गौएं थीं | दुःख की बात हैं कि इस समय गौएं बहुत काफी मात्रा में मारी जा रही है | यह कानून है की १४ वर्षसे कम आयुकी गौएं न मारी जाय, किन्तु यह कानून केवल सरकारी कागजों में ही है | यह कानून काममें लेने के लिए नहीं बना केवल लोगों को दिखाने के वास्ते बनाया गया है ताकि लोगों में उत्तेजना न हो | छोटे-छोटे बछड़े-बछिया भी मारे जाते है; क्योंकि उनका चमड़ा मुलायम होता है, बढ़िया होता है |

अपने आप मरने वाली गौवों का चमडा कठोर होता है , उनके जूते ख़राब तथा सस्ते होते हैं और जीवित गौका या बछड़े-बछिया का चमड़ा उतारा जाय तो वह ज्यादा मुलायम होता है | कसाईखाने में गाय को मार मारकर या उसपर गरम पानी छिड़ककर उसके जीते ही उसका चमडा उतरा जाता है, चमड़ा उतारते हुए वह कांपती, डकारती-छटपटाती, तड़प-तड़पकर मर जाती है | चमडा पहले इसलिए उतार लिया जाता है, जिससे ज्यादा मुलायम बनें | मुलायम चमड़े से बनी हुई टोपी, घडी, बैग और जूता आदि महंगे बिकते हैं |
इस पापके भागी छः लोग होते हैं –

१. गायकों कसाई के यहाँ बिक्री करने वाले
२. गायके वध के लिए सलाह-आज्ञा देने वाले
३. गायको मारने वाले
४. मांस खरीदनेवाले या पकानेवाले
५. गोमांस का भक्षण करनेवाले
६. चमड़ा या अन्य अवयव से बनी वस्तुओं का उपभोग करने वाले |

मांसके विषय में मनुजी ने बतलाया है कि हिंसा करनेवाले, उसमे सम्मति देनेवाले, बिक्री करनेवाले, पकानेवाले और खानेवाले  – ये सभी समानरूपसे पापके भागी होते हैं | इस बात को सुनकर इसके विरोधमे आजसे ही प्रतिज्ञा लेनी चाहिए की

१. चमड़े से बनी हुई टोपी, घडी, बैग और जूता आदि का इस्तेमाल कभी नहीं करेंगे |

२. जिन होटलों में गौवों का मांस पकाया जाता है, हम कभी उन होटलों में नहीं जायेंगे | कुछ लोग कहते हैं हम वहां जाते हैं पर मांस नहीं खाते | भलें भी न खाओ पर उसका रस दालमें, भातमें, परोसनेवाली चम्मच आदिके द्वारा पड जाता होगा, सारे सामानोमें चम्मत पड़ती ही होगी, हाथ वही, संसर्ग वही | उसके परमाणुतो आ ही जाते हैं | इसलिए होटलों में न जाने की शपथ लेनी चाहिए | होटलों में गए बिना भी बहुत लोग जी रहे हैं कोई मर तो नहीं गया |

krishna_cow

३. दूसरी बात हैं कि जिसे आप अपनी यथाशक्ति कर सकते हैं | जहाँ कहीं गोरक्षा आन्दोलन हो उसमे भाग लेना चाहिए ताकि गायोंकी हिंसा बंद हो जानि चाहिए | हिन्दुस्तानमें गोहत्या बंद होनी चाहिए | महात्मा गांधी ने भी कहा था स्वराज्य मिल जाये फिर मेरी यही इच्छा है कि ‘मैं गौहत्या बंद कर दूंगा ‘ |

Bhakti – भग्वद्प्रेम

प्रेम सारी दैवी सम्पतियों का मूल स्रोत है |

जहाँ प्रेम है, वहाँ त्याग, सद्भावना, क्षमा, उदारता, मैत्री, अहिंसा, सेवा, सरलता, निष्कामता, प्रसन्नता, सत्य, विश्वास और साहस आदि सद्गुण अपने आप आ जाते है | इसके विपरीत जहाँ स्वार्थ है, वहीं भय है और जहाँ भय है वहीं दुर्भाव, कामना, क्रोध, अनुदारता, द्वेष, वैर, कपट, दंभ, विषद, अविश्वास, घृणा, लोभ, कायरता और कुटिलता आदि नीच वृत्तियाँ अपने आप उत्पन्न हो जाती है |

प्रेम जितना शुद्ध होगा, उतना ही भगवदभिमुख होगा और जहाँ भगवदप्रेम होगा, वहाँ मनुष्य में निर्भयता और निश्चिन्तता इतनी अधिक बढ़ जाएगी की वह कर्तव्यपालनमें, सत्यभाषणमें, दुसरों का उपकार करनेमें, अपना सर्वस्व देकर भी सेवा करनेमें और जीवनकी महान कठिनाइयोंमें जरा भी नहीं डरेगा | वह दृढ़प्रतिज्ञ, मनस्वी, तेजस्वी, साहसी और वीर होनेके साथ ही अत्यंत विनम्र, आदर्श, विनयी, मधुरभाषी, समझकर करनेवाला और शांतिप्रिय होगा | उससे किसीका अपकार तो होगा ही नहीं | वहा सर्वथा नि:स्वार्थ, भगवद्विश्वासी, भगवदकृपापर निर्भर रहनेवाला और सदा आनंदमें निमग्न रहनेवाला होगा |

भगवत्प्रेमी या तो सारे संसारमें भगवानको देखता है या सारे संसारको भगवानमें देखता है | इसलिए वह स्वाभाविक ही निर्भय, नमनशील, विश्वप्रेमी, विश्वसेवक और विशालह्रदय होगा | उसका न तो कोई वैरी रहेगा और न उसकी किसी वस्तुविशेषमें आसक्ति ही होगी | वह हमेशा ईश्वर भक्ति और कर्म में कार्यरत रहेगा |