कल्याण के लिए गीता

गीताका मुख्य लक्ष्य है की मनुष्य किसी भी वाद, मत, सिद्धांत माननेवाला क्यों न हो, उसका प्रत्येक स्थिति में कल्याण हो जाय, वह किसी भी परिस्थिति में परमात्मा प्रप्तिसे वंछित न रहे; क्योंकि जीवमात्रका मनुष्य योनी जन्म केवल अपने कल्याण के लिए ही हुवा है |

संसार में ऐसी कोई भी परिस्थिति नहीं है, जिसमें मनुष्य का कल्याण न हो सकता हो | कारण की परमात्मतत्त्व प्रत्येक परिस्थिति में समानरूपसे विद्यमान है | अतः साधक के सामने कोई भी और कैसी भी परिस्थिति आये, उसका केवल सदुपयोग करना है |
सदुपयोग करने का अर्थ है – दुःखदायी परिस्थिति आनेपर सुखकी इच्छा का त्याग करना; और सुखदायी परिस्थिति आनेपर सुखभोगका और ‘ऐसी स्थिति बनी रहे’ ऐसी इच्छा का त्याग करना और उसको दूसरों की सेवामें लगाना |

इस प्रकार सदुपयोग करने से मनुष्य दुःखदायी और सुखदायी – दोनों परिस्थितियों से ऊँचा उठ जाता है अर्थात उसका कल्याण हो जाता है |