Bhakti – भग्वद्प्रेम

प्रेम सारी दैवी सम्पतियों का मूल स्रोत है |

जहाँ प्रेम है, वहाँ त्याग, सद्भावना, क्षमा, उदारता, मैत्री, अहिंसा, सेवा, सरलता, निष्कामता, प्रसन्नता, सत्य, विश्वास और साहस आदि सद्गुण अपने आप आ जाते है | इसके विपरीत जहाँ स्वार्थ है, वहीं भय है और जहाँ भय है वहीं दुर्भाव, कामना, क्रोध, अनुदारता, द्वेष, वैर, कपट, दंभ, विषद, अविश्वास, घृणा, लोभ, कायरता और कुटिलता आदि नीच वृत्तियाँ अपने आप उत्पन्न हो जाती है |

प्रेम जितना शुद्ध होगा, उतना ही भगवदभिमुख होगा और जहाँ भगवदप्रेम होगा, वहाँ मनुष्य में निर्भयता और निश्चिन्तता इतनी अधिक बढ़ जाएगी की वह कर्तव्यपालनमें, सत्यभाषणमें, दुसरों का उपकार करनेमें, अपना सर्वस्व देकर भी सेवा करनेमें और जीवनकी महान कठिनाइयोंमें जरा भी नहीं डरेगा | वह दृढ़प्रतिज्ञ, मनस्वी, तेजस्वी, साहसी और वीर होनेके साथ ही अत्यंत विनम्र, आदर्श, विनयी, मधुरभाषी, समझकर करनेवाला और शांतिप्रिय होगा | उससे किसीका अपकार तो होगा ही नहीं | वहा सर्वथा नि:स्वार्थ, भगवद्विश्वासी, भगवदकृपापर निर्भर रहनेवाला और सदा आनंदमें निमग्न रहनेवाला होगा |

भगवत्प्रेमी या तो सारे संसारमें भगवानको देखता है या सारे संसारको भगवानमें देखता है | इसलिए वह स्वाभाविक ही निर्भय, नमनशील, विश्वप्रेमी, विश्वसेवक और विशालह्रदय होगा | उसका न तो कोई वैरी रहेगा और न उसकी किसी वस्तुविशेषमें आसक्ति ही होगी | वह हमेशा ईश्वर भक्ति और कर्म में कार्यरत रहेगा |

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